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Amit



बादलों का शोर है, ये देख नाचता मोर है, बिजली की गडगड़ाहत है, हवाओं की शरशरहात है, जरूर कुछ तो बात है, ये भी क्या दिलकश शुरुआत है, जब बरसती सावन की पहली बरसात है, बादलों का साथ छोर अब गिरने को तैयार है, कुछ बिछड़ो को कुछ अपनों को मिलाने को छोडा अपना संसार है, धरती पर गिरकर उसकी प्यास भुजाती है, मिट्टी में मिलकर उसकी सौगन्ध बढाती है, ये सावन की पहली बरसात है साहब ना जाने कितनो का दिल लुभाती है, अपनी हर बूंद में तुम्हरा अक्ष दिखाती है, कुछ धुंधला सा ही सही पर हर पक्ष दिखाती है, जब भी स्पर्श करती मुझको तुम्हारा एहसास कराती है, चन्द लमहों की हो पर सब यादें ताजा कर जाती है, खुद अधूरी होकर ना जाने कितनो को पूरा कर जाती है, तुम्हारा एहसास मुझे समुद्र तक लाया है, कम्बक्त उस धुंधले अक्ष ने मिलकर समुद्र में तुम्हारा चेहरा बनाया है, इन बारिश की बूंदों में तेरा ही साया है, दूर होकर भी कितना पास बताया है, मेने तो बस शब्दों के जरिये इश्क़ जताया है, ए जान सच कहूँ तो इश्क़ तुझसे है कितना इस सावन की बारिश की बूँदों ने बताया है ।।